चौदह सितम्बर २०१५ को मेरे हिंदी ब्लॉग के दो वर्ष पूरे हो गये. बीच में व्यस्तता के कारण ब्लॉग को अपडेट नहीं कर पाया। पिछले दिनों इंटरमीडिएट में खैर इंटर कॉलेज बस्ती में साथ पढ़े एक मित्र से मोबाईल फोन पर बातचीत हुई. पुराने दिनों की याद और भी ताज़ा हो गयी। कुछ-एक छिटपुट घटनाएँ यहाँ लिख रह हूँ:
एक दिन हिंदी के गुरू जी श्री शेषनाथ पाण्डेय जी पढ़ा रहे थे। किन्ही कारणों से हम मित्रों को आगे की लाइन वाली अपनी मनपसंद सीट बैठने के लिए नहीं मिल पायी थी, सो सभी ने निर्णय लिया की आज सबसे पीछे की लाइन में बैठा जाय. हम सब वहीँ बैठे। क्लास में हमें सिर्फ सिर ही सिर ही दिखाई दे रहे थे। अध्यापक की नजरों से दूर बैठे -बैठे हमारा मन शरारती हो रहा था। किसी ने एक चुटकुला सुनाया, सब तो अपनी हँसी पर कंट्रोल कर ले गए पर एक मित्र जोर से हँस पड़ा। गुरू जी नाराज़ हो गए पूछने लगे कि, "कौन हँसा?" सभी चुप. उन्होंने दुबारा पूँछा कि मुझे पता है की लास्ट लाइन में कोई हँस रहा था मुझे बताओ। अगर नहीं बताओगे तो सभी को दंड मिलेगा।फिर एक एक करके सबको उठाकर पूँछने लगे कि तुम बताओ -तुम बताओ। हर एक कहता कि गुरु जी हमें नहीं पता कि कौन हंस रहा था। अब मेरी बारी थी। उन्ही दिनों मैंने सच बोलने का अभ्यास शुरू किया था। ये मेरे लिए बड़े संकट की घडी थी कि मैं क्या बोलूं ? सच या झूठ। ऊपर से गुरु जी "मित्रता" नामक पाठ पढा चुके थे या पढ़ा रहे थे ठीक से याद नहीं है। मित्र का साथ दूँ या विश्वासघात करुं। मैं खड़ा हुआ और सबकी आशा के विपरीत मैंने उत्तर दिया , "गुरु जी मुझे पता है कि कौन हँस रहा था, पर मैं बताऊंगा नहीं। " पूरी क्लास में सन्नाटा छ गया। सभी स्तब्ध। गुरूजी भी। उन्होंने मुझसे कहा कि यदि तुम उसका नाम नहीं बताओगे तो तुम्हें दण्ड मिलेगा। मैं काँप गया। गुरूजी बहुत सख़्त थे। फिर भी मैं अपनी बात पर अड़ा रहा। मुझे सजा दी गयी। कहा गया कि अपनी बेंच पर खड़े हो जाओ। मैं खड़ा हो गया। गुरु जी ने पढाना शुरू किया। पढ़ते समय मैं हमेशा ऑय कांटेक्ट मेन्टेन करता था। गुरु जी ने मुझे देखा, मैंने गुरु जी को। बेंच पर खड़ा होने की वजह से मैं क्लास की सामान्य परिधि से थोड़ा ऊपर था। ऑय कांटेक्ट की वजह से गुरु जी सिर्फ मुझे पढाने लगे और सारी क्लास गुरु जी के आँखों से ओझल । मेरे और गुरु जी की बीच १२० डिग्री का कोड़ बन गया जबकि बाकी सारी क्लास ९० डिग्री पर थी। इसका आभास होते ही उन्होंने मेरी सजा माफ़ कर दी। मुझे बैठने को कहा और सामान्य ढंग से पढ़ाने लगे।
एक दिन हिंदी के गुरू जी श्री शेषनाथ पाण्डेय जी पढ़ा रहे थे। किन्ही कारणों से हम मित्रों को आगे की लाइन वाली अपनी मनपसंद सीट बैठने के लिए नहीं मिल पायी थी, सो सभी ने निर्णय लिया की आज सबसे पीछे की लाइन में बैठा जाय. हम सब वहीँ बैठे। क्लास में हमें सिर्फ सिर ही सिर ही दिखाई दे रहे थे। अध्यापक की नजरों से दूर बैठे -बैठे हमारा मन शरारती हो रहा था। किसी ने एक चुटकुला सुनाया, सब तो अपनी हँसी पर कंट्रोल कर ले गए पर एक मित्र जोर से हँस पड़ा। गुरू जी नाराज़ हो गए पूछने लगे कि, "कौन हँसा?" सभी चुप. उन्होंने दुबारा पूँछा कि मुझे पता है की लास्ट लाइन में कोई हँस रहा था मुझे बताओ। अगर नहीं बताओगे तो सभी को दंड मिलेगा।फिर एक एक करके सबको उठाकर पूँछने लगे कि तुम बताओ -तुम बताओ। हर एक कहता कि गुरु जी हमें नहीं पता कि कौन हंस रहा था। अब मेरी बारी थी। उन्ही दिनों मैंने सच बोलने का अभ्यास शुरू किया था। ये मेरे लिए बड़े संकट की घडी थी कि मैं क्या बोलूं ? सच या झूठ। ऊपर से गुरु जी "मित्रता" नामक पाठ पढा चुके थे या पढ़ा रहे थे ठीक से याद नहीं है। मित्र का साथ दूँ या विश्वासघात करुं। मैं खड़ा हुआ और सबकी आशा के विपरीत मैंने उत्तर दिया , "गुरु जी मुझे पता है कि कौन हँस रहा था, पर मैं बताऊंगा नहीं। " पूरी क्लास में सन्नाटा छ गया। सभी स्तब्ध। गुरूजी भी। उन्होंने मुझसे कहा कि यदि तुम उसका नाम नहीं बताओगे तो तुम्हें दण्ड मिलेगा। मैं काँप गया। गुरूजी बहुत सख़्त थे। फिर भी मैं अपनी बात पर अड़ा रहा। मुझे सजा दी गयी। कहा गया कि अपनी बेंच पर खड़े हो जाओ। मैं खड़ा हो गया। गुरु जी ने पढाना शुरू किया। पढ़ते समय मैं हमेशा ऑय कांटेक्ट मेन्टेन करता था। गुरु जी ने मुझे देखा, मैंने गुरु जी को। बेंच पर खड़ा होने की वजह से मैं क्लास की सामान्य परिधि से थोड़ा ऊपर था। ऑय कांटेक्ट की वजह से गुरु जी सिर्फ मुझे पढाने लगे और सारी क्लास गुरु जी के आँखों से ओझल । मेरे और गुरु जी की बीच १२० डिग्री का कोड़ बन गया जबकि बाकी सारी क्लास ९० डिग्री पर थी। इसका आभास होते ही उन्होंने मेरी सजा माफ़ कर दी। मुझे बैठने को कहा और सामान्य ढंग से पढ़ाने लगे।
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