Friday, September 20, 2013

एम फिल, पीएचडी और समर्पण

रिनपास (Ranchi Institute of Neuropsychiatry and  Allied Sciences, http://rinpas.nic.in/), रांची में अपने एम फिल (मेडिकल और सोसल सायकालोजी) dissertation के लिए मैंने वर्ष २००० में समर्पण लिखा था।  मेरे dissertation की गाइड डॉ. मसरूर जहाँ थीं। टॉपिक था ,"Personality Characteristics of Schizophrenic Patients with and without Criminal History " .  मैडम बड़े मनोयोग से मेरी लिखी हुयी चीजें पढ़ती और correction करतीं।  Correction पर करेक्शन होते गये, और अंततः dissertation का जो फाइनल रूप मेरे सामने आया, वो उससे एकदम भिन्न था, जो मैं लिखकर देता था। उस समय मन में बड़ी कोफ़्त हुयी कि,  जिंदगी की पहली थीसिस और इसमें अपने मन से लिखा कुछ भी नहीं, या तो रिसर्चर्स की findings या मैडम का किया हुआ correction. कुल मिलकर एहसास हुआ कि सिर्फ Acknowledgement और समर्पण ही अपना हो सकता है। इसी अकुलाहट में ये समर्पण लिखा गया। उस समय अंतिम पद्य की प्रथम दो पंक्तियाँ नही लिखी गयी थीं। ये पंक्तियाँ १२ वर्षों के पश्चात अपने  PhD Thesis में मैंने जोड़ा और शीर्षक रखा 'समर्पण और आभार''समर्पण और आभार' पढ़ने के लिए या मेरी अन्य कवितायें पढ़ने के लिए लिंक https://apnisochabhivyaktiapni.blogspot.com/2013/09/blog-post_16.html पर जाया जा सकता है।  पीएचडी थीसिस मैने Dr. S. C. Tiwari Sir की guidance में वृद्धावस्था मानसिक स्वास्थ्य विभाग , किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (http://kgmu.org/) से किया । टॉपिक है ,"A Clinical Psychological Study of Cognitive Functioning as a Determinant of Quality of Life amongst Urban Elderlies ".   मैं  अपने दोनों गुरूजनों का कृतज्ञ हूँ जिन्होंने मुझे इस लायक बनाया कि पहले मैं एक चिकित्सा मनोवैज्ञानिक बना और फिर चिकित्सा मनोविज्ञान में अध्यापक (http://kgmu.org/department_details.php?dept_type=2&dept_id=14&page_type=faculty_and_staff)। गुरु की वंदना में  ये श्लोक जगप्रसिद्ध है मैं अपने गुरुजनों की वंदना करता हूँ -
With Dr. S. C. Tiwari
गुरुर ब्रम्हा गुरुर विष्णु गुरुर देव महेश्वरः ,
गुरुर साक्षात् परमब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः।       
With Dr. Masroor Jahan 
                                                             
The most awaited moment of my life......
Doctor of Philosophy (Ph.D.) Degree Awarded on September 29, 2013, in the 9th Convocation of
King George;s Medical University, Lucknow, India


Tuesday, September 17, 2013

मनोविज्ञान से परिचय

बात पिछले ब्लॉग http://rakeshuvaach.blogspot.in/2013/09/blog-post.html  से शुरू करते  हैं।  मैंने लिखा था १४-१५ वर्ष की आयु में मुझे विरह वेदना हुयी थी और मेरे मुह से कुछ शब्द निकले थे, "जिसके लिए मैंने अपनों को कुछ नहीं समझा , उसी ने आज मुझे मेरी औकात बताई।   ये आयु विरह वेदना के लिए कम है, ऐसा लोगों का मानना है।  पर इसकी शुरुआत तो इसके पहले ही हो चुकी थी। नवीं -दसवीं क्लास में। ये घटना दसवीं की है। कुछ वक्त सुधरने में लगा और फिर कुछ दिन के बाद अपने आपको धिक्कारते हुए एक शायरी लिखी - वालिद का नाम रोशन करने की फिक्र कर, दाग दामन में गर लगा के जिया भी तो क्या जिया। जीवन की पटरी लाइन पर आयी. मेलजोल फिर से बढ़ा. पुस्तकों का आदान -प्रदान हुआ और पहली बार मेरा परिचय मनोविज्ञान विषय से हुआ।   हुआ यूँ, कि, जिस पुस्तक में मुझे पत्र (आप प्रेम पत्र समझ सकते हैं) मिला वो मनोविज्ञान की थी।  मैंने पूरी पुस्तक पढ़ डाला, यद्यपि की मैं बायलोजी का स्टूडेंट   था।  नोट्स भी बना लिए। फिर कुछ दिनों के पश्चात मेरे एक मित्र की वजह से गलतफहमी इतनी बढ़ी कि इस सम्बन्ध का पटाक्षेप हो गया।  मुझे आज भी इस बात का दुःख है कि, वो गलतफहमी आज तक बनी हुयी है। दिल में अब भी एक टीस है।  इस घटना के १०-१२  वर्षो के उपरांत  आज मैं एक चिकित्सा मनोवैज्ञानिक (Clinical Psychologist) हूँ।

मेरा चिकित्सा मनोवैज्ञानिक बनना क्या महज एक इत्तफाक था ?
या फिर अवचेतन मन में उपस्थित इस वेदना को  compensate करने के लिये मेरी सारी ऊर्जा इस ओर अग्रसर हुयी ?
क्या उपर्युक्त घटना का मेरे जीवन पर इतना व्यापक प्रभाव पड़ा?
या फिर ये कोई सुनियोजित प्लान था अपने कैरियर को शेप देने का?
इस विषय पर आपका क्या सोचना है?

आगे के   पृष्ठों   में हम इसका विश्लेषण करेंगे।


वो शपथ जिसने मेरी ज़िन्दगी बदल दी :

Monday, September 16, 2013

अपनी बात

सुकवि सुमित्रानंदन पंत जी ने कवि  और कविता के बारे में जो लिखा है , " वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान, उमड़ कर आँखों से चुप-चाप बही होगी कविता अन्जान।"   कुछ ऐसी ही भावना आदिकवि महर्षि  वाल्मीकि जी के भी मन में क्रौंच वध के समय उत्पन्न हुई थी, "मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥" ऐसी मान्यता है कि  उनके द्वारा पृथ्वी पर यह प्रथम काव्य रचना हुयी थी। 
मैंने भी अब तक यही समझा और जाना है कि, विभिन्न परिस्थितियों एवं भावनाओं के वशीभूत स्वतः स्फूर्त अभिव्यक्ति ही कविता है।  कोई आवश्यक नहीं कि सभी मेरी बात से सहमत हों। मैं तो बस अपनी बात कह रहा हूँ।  मेरे मन में प्रथम बार ऐसी अभिव्यक्ति  १४-१५ वर्ष की आयु में किसी विशेष परिस्थिति में उत्पन्न हुयी थी- "जिसके लिए मैंने अपनों को कुछ नहीं समझा, उसी ने आज मुझे मेरी औकात बतायी। " यह  स्वतः स्फूर्त अभिव्यक्ति भले ही स्तरीय न रही हो परन्तु, उस आयु और अवस्था के सर्वथा अनुकूल थी। 
मेरी रचनायें, जीवन की विभिन्न परिस्थितियों से उत्पन्न अनुभवों एवं भावनाओं की स्वतः स्फूर्त अभिव्यक्तियाँ हैं।  कभी-कभी तो बेचैनी और छटपटाहट का अनुभव होता था, और कोई कविता आकार ले लेती थी, तो अपने आप ये बेचैनी और छटपटाहट कम हो जाती थी।  इनमें चाह कर लिखी गयी रचनाएँ नगण्य हैं। इन्ही कुछ  रचनाओं को  आप तक पहुचाने के उद्देश्य से मैंने एक ब्लॉग की शुरुआत की है- अपनी सोच.…जिसका लिंक है - https://apnisochabhivyaktiapni.blogspot.in/
मैं, आप सभी को आमंत्रित करता हूँ कि आप इसे पढ़ें और बताएं कि अपनी सोच में मैं कहाँ तक खरा उतर सका हूँ।  
सधन्यवाद,
आपका अपना 
राकेश त्रिपाठी