Monday, September 16, 2013

अपनी बात

सुकवि सुमित्रानंदन पंत जी ने कवि  और कविता के बारे में जो लिखा है , " वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान, उमड़ कर आँखों से चुप-चाप बही होगी कविता अन्जान।"   कुछ ऐसी ही भावना आदिकवि महर्षि  वाल्मीकि जी के भी मन में क्रौंच वध के समय उत्पन्न हुई थी, "मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥" ऐसी मान्यता है कि  उनके द्वारा पृथ्वी पर यह प्रथम काव्य रचना हुयी थी। 
मैंने भी अब तक यही समझा और जाना है कि, विभिन्न परिस्थितियों एवं भावनाओं के वशीभूत स्वतः स्फूर्त अभिव्यक्ति ही कविता है।  कोई आवश्यक नहीं कि सभी मेरी बात से सहमत हों। मैं तो बस अपनी बात कह रहा हूँ।  मेरे मन में प्रथम बार ऐसी अभिव्यक्ति  १४-१५ वर्ष की आयु में किसी विशेष परिस्थिति में उत्पन्न हुयी थी- "जिसके लिए मैंने अपनों को कुछ नहीं समझा, उसी ने आज मुझे मेरी औकात बतायी। " यह  स्वतः स्फूर्त अभिव्यक्ति भले ही स्तरीय न रही हो परन्तु, उस आयु और अवस्था के सर्वथा अनुकूल थी। 
मेरी रचनायें, जीवन की विभिन्न परिस्थितियों से उत्पन्न अनुभवों एवं भावनाओं की स्वतः स्फूर्त अभिव्यक्तियाँ हैं।  कभी-कभी तो बेचैनी और छटपटाहट का अनुभव होता था, और कोई कविता आकार ले लेती थी, तो अपने आप ये बेचैनी और छटपटाहट कम हो जाती थी।  इनमें चाह कर लिखी गयी रचनाएँ नगण्य हैं। इन्ही कुछ  रचनाओं को  आप तक पहुचाने के उद्देश्य से मैंने एक ब्लॉग की शुरुआत की है- अपनी सोच.…जिसका लिंक है - https://apnisochabhivyaktiapni.blogspot.in/
मैं, आप सभी को आमंत्रित करता हूँ कि आप इसे पढ़ें और बताएं कि अपनी सोच में मैं कहाँ तक खरा उतर सका हूँ।  
सधन्यवाद,
आपका अपना 
राकेश त्रिपाठी  

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