Tuesday, September 17, 2013

मनोविज्ञान से परिचय

बात पिछले ब्लॉग http://rakeshuvaach.blogspot.in/2013/09/blog-post.html  से शुरू करते  हैं।  मैंने लिखा था १४-१५ वर्ष की आयु में मुझे विरह वेदना हुयी थी और मेरे मुह से कुछ शब्द निकले थे, "जिसके लिए मैंने अपनों को कुछ नहीं समझा , उसी ने आज मुझे मेरी औकात बताई।   ये आयु विरह वेदना के लिए कम है, ऐसा लोगों का मानना है।  पर इसकी शुरुआत तो इसके पहले ही हो चुकी थी। नवीं -दसवीं क्लास में। ये घटना दसवीं की है। कुछ वक्त सुधरने में लगा और फिर कुछ दिन के बाद अपने आपको धिक्कारते हुए एक शायरी लिखी - वालिद का नाम रोशन करने की फिक्र कर, दाग दामन में गर लगा के जिया भी तो क्या जिया। जीवन की पटरी लाइन पर आयी. मेलजोल फिर से बढ़ा. पुस्तकों का आदान -प्रदान हुआ और पहली बार मेरा परिचय मनोविज्ञान विषय से हुआ।   हुआ यूँ, कि, जिस पुस्तक में मुझे पत्र (आप प्रेम पत्र समझ सकते हैं) मिला वो मनोविज्ञान की थी।  मैंने पूरी पुस्तक पढ़ डाला, यद्यपि की मैं बायलोजी का स्टूडेंट   था।  नोट्स भी बना लिए। फिर कुछ दिनों के पश्चात मेरे एक मित्र की वजह से गलतफहमी इतनी बढ़ी कि इस सम्बन्ध का पटाक्षेप हो गया।  मुझे आज भी इस बात का दुःख है कि, वो गलतफहमी आज तक बनी हुयी है। दिल में अब भी एक टीस है।  इस घटना के १०-१२  वर्षो के उपरांत  आज मैं एक चिकित्सा मनोवैज्ञानिक (Clinical Psychologist) हूँ।

मेरा चिकित्सा मनोवैज्ञानिक बनना क्या महज एक इत्तफाक था ?
या फिर अवचेतन मन में उपस्थित इस वेदना को  compensate करने के लिये मेरी सारी ऊर्जा इस ओर अग्रसर हुयी ?
क्या उपर्युक्त घटना का मेरे जीवन पर इतना व्यापक प्रभाव पड़ा?
या फिर ये कोई सुनियोजित प्लान था अपने कैरियर को शेप देने का?
इस विषय पर आपका क्या सोचना है?

आगे के   पृष्ठों   में हम इसका विश्लेषण करेंगे।


वो शपथ जिसने मेरी ज़िन्दगी बदल दी :

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