Friday, September 6, 2019

ज्येष्ठ भ्राता श्री राजेश त्रिपाठी जी को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कृष्ण पक्ष, भाद्रपद, विक्रम सम्वत 2076 तद्नुसार दिनांक 23 अगस्त 2019 की रात्रि 3.00 बजे के आसपास जब भारतवर्ष श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव प्रसाद ग्रहण के पश्चात निद्रामग्न हुआ ही होगा, मेरे ज्येष्ठ भ्राता श्री राजेश त्रिपाठी जी चिरनिद्रा में लीन हो गये।  मानो उन्हें प्रतीक्षा थी कि श्रीकृष्ण जन्म लेने के पश्चात उनका कष्ट हर लेंगे।  वे कई महीनों से अस्वस्थ चल रहे थे।  उनकी चिकित्सा पहले बस्ती फिर किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय में हुई और बाद में उन्हें संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ रेफर कर दिया गया था। 

मेरे ज्येष्ठ भ्राता स्वर्गीय श्री राजेश त्रिपाठी जी की जन्म तिथि जो हाईस्कूल के प्रमाण पत्र पर अंकित है वो 15/04/1966 है।  उनका देहांत विक्रम संवत 2076 के भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि (श्रीकृष्ण जन्माष्टमी) तद्नुसार दिनांक 23/08/2019 को लगभग 53 वर्ष की आयु में हुआ।  वे अपने पीछे तीन पुत्र (रमेंद्र त्रिपाठी, राजेंद्र त्रिपाठी, माधवेंद्र त्रिपाठी), एक पुत्री (राजलक्ष्मी त्रिपाठी), पत्नी (श्रीमती उर्मिला त्रिपाठी), माँ-पिता (श्रीमती पार्वती देवी-श्री राम राज त्रिपाठी), भाई-भयहु (राकेश कुमार त्रिपाठी-श्रीमती सुषमा त्रिपाठी), दो बहनें (श्रीमती राधा रानी व श्रीमती सुनीता पांडेय), एक भतीजा (देव त्रिपाठी) और एक भतीजी (प्रियांशी त्रिपाठी) के साथ-साथ वृहद् नाते-रिश्तेदारों और मित्रों का समूह छोड़ गये हैं।  इसके १२ वर्षों पूर्व महाशिवरात्रि को मझली दीदी श्रीमती अनीता त्रिपाठी जो भैया से छोटी थीं का स्वर्गवास हो चुका था।

शव का दाह संस्कार बैकुण्ठ धाम अयोध्या में 24 अगस्त 2019 को उनके ज्येष्ठ पुत्र रमेंद्र ने बंधु-बांधवो, हित-मित्रों और नाते- रिश्तेदारों की उपस्थिति में किया। दशगात्र एक सितंबर, ब्रह्भोज 3 सितंबर और बरसी 5 सितंबर 2019 को आवास विकास कालोनी, बस्ती स्थित आवास से संपन्न हुआ।  उपस्थित अधिकांश लोगों ने उनके बारे मे कहा, "संत आदमी थे"।

भैया मुझसे 10 वर्षों से भी अधिक बड़े थे।  मेरे जीवन को संवारने मे उनका बड़ा योगदान रहा। 

बड़ा भाई अपने छोटे भाई या पिता अपने पुत्र में खेल-खेल में आत्मविश्वास कैसे जगा देता है, उसका अनुभव मैंने भैया के साथ पाया। खेल-खेल में मैं उन्हें पटक देता हूँ, ऐसा मुझे गुमान था।  और इस गुमान मे मैं कभी अपने सहपाठियों और हम उम्र मित्रों से न दबा, न डरा, तनकर खड़ा हुआ और जीता भी।  मैं सोचता था कि, जब मैं अपने भैया को पटक देता हूँ तो ये किस खेत की मूली हैं। वे चाहे अपने विद्यालय के हों या किसी और।  ये बात और है कि, अपने से जबर लड़के से कभी पटखनी भी खायी, क्योंकि हर कोई बड़ा भाई नहीं होता जो जानबूझकर हार जाय।

जब मैं छोटा था तो पढ़ने के लिए प्रातःकाल ही जगा देते थे।  पढ़ते-पढ़ते कुछ देर के बाद पुनः नींद आ जाती तो सो जाता, फिर जगाते और मारने का भय दिखाते तो माँ के पास भाग जाता और शिकायत करता। माँ उन्हें डाँट देती।  मैं बच जाता पर उन्होंने हर कोशिश की कि मैं अच्छे से पढूँ।  लखनऊ की तहसील मलिहाबाद में रहीमाबाद फार्म के पास एक स्कूल था, उसमें पढ़ाने जाया करते थे।  हम रहीमाबाद कस्बे के विद्यालय में पढ़ते थे।  एक दिन बारिश की वजह से हम (मैं और सुनीता बहन) वहाँ न जाकर उनके स्कूल में चले गये।  इन्होंने हम दोनों को अपनी कक्षा में बैठाया और पढ़ाने लगे।  कक्षा कार्य कराया और गलत हो जाने पर उतना ही दंड दिया जितना कि और बच्चों को।  भाई-बहन होने पर भी कोई छूट नहीं दी।  उस समय तो बहुत बुरा लगा पर वयस्क होने पर ज्ञात हुआ कि, सबको समान भाव से देखना और व्यवहार करने का उनका ये विशेष गुण था।

पिताजी के विरोध के बाद भी कक्षा आठ मे पढ़ने के लिये उन्होंने मेरा प्रवेश सरस्वती विद्या मंदिर, रामबाग, बस्ती मे कराया।  ये उस समय बस्ती के श्रेष्ठ विद्यालयों में से एक था।  वहाँ का शुल्क अधिक था और परिवार के सदस्य अधिक।  पिता जी का कहना था कि कम शुल्क वाले विद्यालय में भी नाम लिखाया जा सकता है।  पर भैया नहीं माने।  मेरे जीवन पर उस एक वर्ष के अध्ययन की अमिट छाप पड़ी। सच्चे अर्थों में मैं विद्यार्थी वहीं बना और जीवन मे सफल होने के मार्ग प्रशस्त हुये।  मेरे विवाह हेतु भी वही अड़े थे, कि होगा तो वहीं होगा जहाँ आज मेरी ससुराल है।  मेरे लिये जो भी बात उन्हें सही और उचित लगी उसके लिये वे अड़ गये और बात मनवा कर छोड़ी।  मैं जब बाहर (बनारस, राँची) से लौटकर घर आता तो मुझे साईकिल पर बैठा लेते और कहते कि एक मित्र से मिलाकर लाता हूँ।  मेरे मना करने पर भी नहीं मानते।  और ले जाते भदेश्वर नाथ भगवान शंकर के मन्दिर।  वहाँ दर्शन करवाते, जल और प्रसाद चढ़वाते।  बीच रास्ते में एक दो मित्रों से भी मुलाकात हो जाती पर उनका लक्ष्य भदेश्वर नाथ जी ही होते। सावन, नवरात्रों और गुप्त नवरात्रों मे भी व्रत रहते और अनुष्ठान करते।  ऐसे भक्त थे।  सीधे सरल स्वभाव वाले थे कि हर कोई अपना उल्लू सीधा कर ले।  इन सबके साथ साथ निस्पृह भी थे।  जो सही लगे वो अपना कार्य करना है, भले ही कोई नाराज हो जाय।  माँ पिता जी की बातों का कभी पलट कर जबाब नहीं दिया।  सिर झुका कर सारी बातें सुन लेते।  किसी और के कार्यों से कोई खास लेना देना नहीं।

युवावस्था में लहसुन, प्याज नहीं खाते थे पर लोग चुपके से मसाले में पीसकर मिला देते।  भोजन की प्रशंसा करते तो लोग मन ही मन मुसकराते।

जिस लखनऊ में रहता हूँ और जहाँ आज मेरी आजीविका है, यहाँ प्रथम बार भैया की ही उंगली पकड़ कर आया था।  वे इतना तेज चलते थे कि मैं उनकी उंगली पकड़ दौड़ता था।  मुझे कुत्ते ने काटा था और वे मुझे बलरामपुर चिकित्सालय में सूई लगवाने लाये थे।  मान्यता थी कि कुकरैल नदी में नहाने से कुत्ते का विष उतर जाता है।  वे लेकर गये तो देखा कि ये तो नदी नहीं, गंदा नाला है।  नहाने से मना कर दिया।  हम दोनों ने बलरामपुर अस्पताल में रात बिताई क्योंकि सुई उपलब्ध नहीं थी और अगले दिन भी उपलब्ध न हो सकी।  हमने श्रीकृष्ण बलराम पिक्चर देखी और सायंकाल रहीमाबाद लौट गये।  उसके पश्चात कुत्ते के काटे की चिकित्सा झाड़फूक से करायी गयी थी।  भैया के साथ की मेरे मानस पटल पर अनगिनत घटनाएं, बातें अंकित हैं सबका वर्णन यहाँ संभव नहीं।

भैया की वाक्चातुर्यता, मिलन सारिता, भोलापन, फक्कड़पन, जीवंतता, आस्था, विश्वास मैने जितनी निकटता से महसूस की हैं शायद और लोग नहीं कर पाये।  जीवन को मापने के सबके अलग अलग मापदंड होते हैं, हो सकता है कि वे उन पर खरे न उतर पाये हों।  लेकिन उनके विशेष गुणों के कारण माँ पिता जी को हमेशा उन पर गर्व रहा।  भले ही वे इसे उन्हें प्रेषित न कर पाये हों पर समय -समय पर मुझसे कहा अवश्य है।

कहा जाता है कि बड़ा भाई पिता तुल्य होता है।  मेरे लिये भैया पिता तुल्य रहे।  आप दानी थे।  आपने अपने सामर्थ्य से बढ़कर दान दिया है, मैं इसका साक्षी और सहभागी दोनों रहा हूँ।  भैया, जाने अनजाने जो अपराध आपके प्रति हो गये हों उनके लिये हमें क्षमादान देना।
आप हमारी यादों मे रहेंगे।

ईश्वर आपकी आत्मा को शांति प्रदान कर अपने श्री चरणों में स्थान दें।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। 
ॐ शांति शांति शांतिः।

1 comment:

  1. बहुत सुंदर त्रिपाठी भैया । बड़े भैया को सादर नमन।

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