Thursday, January 3, 2019

मित्रों, ताकि सनद रहे

मित्रों, ताकि सनद रहे
31 दिसंबर 2018 की शाम विद्या मंदिर के 1989 सत्र के 6 मित्रों के मिलन की हास परिहास के साथ जितना याद रह सका उसकी रिपोर्टिंग ताकि सनद रहे। कृपया बात को दिल पर न लें, किसी की भी भावना आहत हो सकती है।😁 आहत आत्मा से निवेदन है कि बिना क्षमा मांगे, क्षमा कर दें। और हाँ, कृपया गलतियों को सुधारकर पढ़ें, तथ्यों के सही या गलत होने की जिम्मेदारी मेरी नहीं है।

समन्वयक संजीव त्रिपाठी और व्यवस्थापक गौरव भाटिया के सस्वार्थ प्रयासों से पत्रकारपुरम चौराहे, गोमती नगर मे देना बैंक के ऊपर स्थित एक बड़े से क्लाउड रेस्तरां के ऊपरी हाल मे बैठक संपन्न हुई। इस पूरी संपत्ति के मालिक भाटिया जी हैं (देना बैंक के धन के सिवाय)। उपस्थिति पंजिका, चित्र और चलचित्र का आनंद तो आप पहले ही व्हाट्सअप पर उठा चुके हैं संजीव और अरुण के सौजन्य से। जिन्होंने न उठाया हो उठा लें। अब पाठकीय आनंद की बारी।

मेरे पहुंचने तक गौरव भाटिया, संजीव त्रिपाठी, शोभित सिंघल और अरुण मणि त्रिपाठी अड्डा जमा चुके थे। गरीबों के मेवा मूंगफली और अमीरों के पेय काफी (मद्य नहीं लिख रहा क्योंकि ये सभी वर्गों का पेय है और न ही इसकी व्यवस्था थी) का दौर चल रहा था। इसके पूर्व इन लोगों की गुफ्तगू का विषय इन्हें ही पता है क्योंकि मैं लगभग एक घंटा की देरी से पहुँचा था।

औपचारिक परिचर्चा मे पता चला कि गौरव नेता और व्यवसाई, संजीव शेयर मार्केट BSE मे प्रबंधक, शोभित विविध विधाओं के सलाहकार, अरुण इंजीनियर और मैं चिकित्सा मनोवैज्ञानिक हो गया हूँ। एक और मित्र अतुल राज वर्मा की प्रतीक्षा थी। वे भी खरामा खरामा जमीन नापते नापते कुछ देरी से पहुंच गए। पता चला लेखपाल हैं। वहाँ गोपनीय बातों का खुलासा हुआ। मीटू.... यूटू... की चर्चाओं के साथ विद्या मंदिर के आचार्यों के कारनामों की पोल भी खुली।

पत्नी, बच्चों और प्रेमिकाओं की बात चली। संजीव ने संस्मरण सुनाये कि वे कब पिटे, कब और कैसे बचे। बीच बीच मे लोग फिक्र को धुएं मे उड़ाते रहे, ये जानते बूझते हुये कि ऐसा करना जानलेवा है । अरुण और शोभित प्रेम की वेदी पर शहीद हो गये। लव मैरिज कर ली। इधर बाकियों ने भी लव मैरिज की पर अलग अलग। लव कहीं, मैरिज कहीं😎। सभी पितृत्व से ओतप्रोत हैं, सबके दो दो बच्चे हैं। इससे अधिक का किसी ने खुलासा नहीं किया😜। पत्नी पीड़ित पति थे तो पत्नी को पीड़ित करनेवाले भी। निष्कर्ष निकला पत्नी अपने ही स्वभाव से पीड़ित होती हैं। पति तो बेचारा भोला भाला होता है, लोग बहला फुसला लेते हैं...।

जीवन के उत्थान मे प्रेमिकाओं के  योगदान की बात हुई। कोई पति बना कोई कवि, मनोवैज्ञानिक, कोई गायक, कोई उपनिषद लिखने की सोच रहा। गीत गाये गये, कविता सुनाई गई, फोटोशूट हुआ, वीडियोग्राफी हुई, रिकार्डिंग हुई। शोभित ने समा बांध दिया अपने गाने से। "नाम गुम जायेगा, चेहरा यूँ बदल जायेगा, मेरी आवाज ही पहचान है गर याद रहे........, चलते चलते मेरे ये गीत याद रखना, कभी अलविदा ना कहना....., कहीं करती होगी वो मेरा इंतजार..., जिस गली मे तेरा घर न हो बालमा.....।" सभी मित्रों ने अपनी क्षमतानुसार गायन मे साथ दिया। मैं अपनी टांग अड़ाता रहा, और शोभित की सुरीली लयबद्ध आवाज़ में व्यवधान डालता रहा। अतुल और अरुण ने अच्छा सुरीला साथ दिया। संजीव ने गजल सुनाई। बहुत अच्छा और सुर मे गाया। बहुत सारे और मित्रों की बात हुई। नाम नहीं लिख रहा, नहीं तो बाकी सोचेंगे कि उनसे ऐसा कौन सा अपराध छूट गया कि उनकी बात नहीं होती। और इस उम्र मे उन्हें प्रेरित करना, मुझसे न हो पायेगा।

अरुण अपने तकनीकी ज्ञान के साथ फोटोग्राफी, वीडियो ग्राफी और संप्रेषण करते रहे। गौरव व्यवस्था में लगे रहे। कुछ लोग खुले, कुछ बाकी रहे। कुछ खुलने के लिए विशेष पेय के साथ अगली मीटिंग की प्रतीक्षा और प्लानिंग के साथ, और हम सब विदा हुये। बहुत आनंद आया। सच मे मित्रों का साथ च्यवनप्राश होता है। आप भी ले लो।

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